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Bharat Ki Sanskritik Ekta Essay Contest

31st October को राष्ट्रीय एकता दिवस क्यों मनाया जाता है ? (Why is Rashtriya Ekta Diwas celebrated on 31st October each year) | राष्ट्रीय एकता दिवस महत्व भाषण कविता अनमोल वचन

Rashtriya Ekta Diwas Mahatva, Bhashan, speech, Kavita, Quotes, Slogan in Hindi राष्ट्रीय एकता दिवस महत्व निबंध भाषण कविता इस आर्टिकल को पढ़े एवम शेयर करें क्यूंकि हम युवाओं को ही एक होकर देश को एकता का सबब सिखाना होगा. सबसे पहले परिवारों में एकता को जगाना होगा तभी ही हम देश से एकता की उम्मीद कर सकेंगे.

राष्ट्रीय एकता दिवस (Rashtriya Ekta Diwas)–

भारत की लोह पुरुष कहे जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है. इस दिन की शुरुवात केन्द्रीय सरकार द्वारा सन 2014 में दिल्ली में की गई है. सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा देश को हमेशा एकजुट करने के लिए अनेकों प्रयास किये गए, इन्ही कार्य को याद करते हुए उन्हें श्रधांजलि अर्पित करने के लिए इस दिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया है.

इस दिन का उद्घाटन नई दिल्ली में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने किया था. मोदी जी ने सरदार पटेल जी की प्रतिमा पर मालार्पण किया, साथ ही ‘रन फॉर यूनिटी’ मैराथन की शुरुवात की. इस कार्यक्रम को इसलिए आयोजित किया गया, ताकि सरदार पटेल द्वारा देश को एकजुट करने के प्रयास को देश-दुनिया के सामने उजागर किया जा सके.

राष्ट्रीय एकता दिवस  एवम भाषण (Rashtriya Ekta Diwas Speech In Hindi)

किसी भी देश का आधार उसकी एकता एवम अखंडता में ही निहित होता हैं. भारत देश कई वर्षो तक गुलाम था. इसका सबसे बड़ा कारण था आवाम के बीच एकता की कमी होना. इस एकता की कमी का सबसे बड़ा कारण उस समय में सुचना प्रसारण के साधनों का ना होना था. साथ ही अखंड भारत पर कई संस्कृतियों ने राज किया. इस कारण भारत देश में विभिन्न जातियों का विकास हुआ. शासन बदलते रहने के कारण एवम विचारो में भिन्नता के कारण मतभेद उत्पन्न होता गया और देश में सबसे बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने राज किया और इन्होने इसी कमी का फायदा उठाकर फूट डालों एवम राज करो की नीति अपनाई. इसी एक हथियार के कारण अंग्रेजों से भारत पर 200 वर्षो की गुलामी की.

इससे जाहिर होता हैं कि देश का विकास, शांति, समृद्धि एवम अखंडता एकता के कारण ही संभव हैं. कौमी लड़ाई देश की नींव को खोखला करती हैं. इससे न निजी लाभ होता हैं ना ही राष्ट्रीय हित. आज भी हम कहीं न कहीं एकता में कमी के कारण ही अन्य देशों से पीछे हैं. जाति वाद के दलदल में फँसकर हम देश की एकता को कमजोर कर रहे हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण इतिहास के पन्नो में हैं. सन 1857 की क्रांति के विफल होने का कारण एकता में कमी ही था. मुगुलो ने भी भारत पर शासन एकता की कमी के कारण ही किया था.

इस मतभेद को समझ लेने के बाद ही देश के कई महान स्वतंत्रता सेनानियों ने सबसे पहले इस मुश्किल को कम करने की कोशिश की. कई बड़े- बड़े नेताओं ने आजादी के लिए पहले लोगो को एकता का महत्व बताया. इसके लिए आजादी से पहले समाचार पत्रों एवम रेडिओं प्रसारण का उपयोग किया गया. क्रांतिकारी वीर भले ही जेलों में होते थे,  लेकिन  उस वक्त अपनी कलम के जोर पर उन्होंने देश में एकता का विकास किया. इसी के कारण हमें 1947 में स्वतंत्रता मिली.

  • वर्तमान में एकता का महत्त्व (Ekta Mahatv):

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, न्याय प्रणाली यह सभी चीजे तब ही सुचारू हो सकेंगी, जब आवाम में एकता हो और जिस दिन यह व्यवस्था सुचारू होगी उस दिन देश के विकास में कोई कठिनाई नहीं होगी.

एकता में सबसे बड़ा बाधक स्वहित हैं आज के समय में स्वहित ही सर्वोपरी हो गया हैं. आज जब देश आजाद हैं आत्म निर्भर हैं तो वैचारिक मतभेद उसके विकास में बेड़ियाँ बनी पड़ी हैं.

आजादी के पहले इस फुट का फायदा अंग्रेज उठाते थे और आज देश के सियासी लोग. हमें यह याद रखना चाहिये कि जिस जगह भी दरार होगी मौका परस्त लोग उसमे अपने लाभ खोजेंगे ही. ऐसी परिस्थती में हमारा ही नुकसान होता हैं.

देश में एकता के स्वर को सबसे ज्यादा बुलंद स्वतंत्रता सेनानी लोह पुरुष वल्लभभाई पटेल ने किया था. वे उस सदी में आज के युवा जैसी नयी सोच के व्यक्ति थे. वे सदैव देश को एकता का संदेश देते थे. उन्ही को श्रद्धांजलि देने हेतु उनके जन्म दिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता हैं.

2017 में कब मनाया जाता हैं राष्ट्रीय एकता दिवस ? (Rashtriya Ekta Diwas 2017 Date) :

लोह पुरुष वल्लभभाई पटेल की स्मृति में उनके जन्मदिन 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता हैं.

राष्ट्रीय एकता दिवस का ऐलान 2014 में किया गया, इसे वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र के प्रति समर्पण को याद में रखकर तय किया गया, इसका ऐलान गृहमंत्री राज नाथ सिंह ने किया.

राष्ट्रीय एकता दिवस मनाने का तरीका (Rashtriya Ekta Diwas Celebration)

2014 के बाद से 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के बारे में जागरूकता बढ़ाने और महान व्यक्ति को याद करने के लिए राष्ट्रव्यापी मैराथन का आयोजन किया जाता है. इस दिवस के साथ देश की युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय एकता का सन्देश पहुँचता है, जिससे आगे चलकर वे देश में राष्ट्रीय एकता का महत्व समझ सकें. इस मौके पर देश के विभिन्न स्थानों में कई कार्यक्रमों का आयोजन होता है. दिल्ली के पटेल चौक, पार्लियामेंट स्ट्रीट पर सरदार पटेल की प्रतिमा पर माला चढ़ाई जाती है. इसके अलावा सरकार द्वारा शपथ ग्रहण समारोह, मार्च फ़ास्ट भी की जाती है.

‘रन फॉर यूनिटी’ मैराथन देश के विभिन्न शहरों, गाँव, जिलों, ग्रामीण स्थानों में आयोजित की जाती है. स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, अन्य शैक्षणिक संसथान, राष्ट्रीय कैडेट कोर,  राष्ट्रीय सेवा योजना के लोग बहुत बढ़ चढ़ कर इस कार्यक्रम में हिस्सा लेते है. दिल्ली में राजपथ में विजय चौक से इंडिया गेट के बीच सुबह 8:30 बजे मैराथन का आयोजन बहुत बड़े स्तर पर होता है, जिसमें कई नेता, अभिनेता हिस्सा लेते है. इसके अलावा सरकारी ऑफिस, पब्लिक सेक्टर में भी शपथ ग्रहण कार्यक्रम होता है. स्कूल कॉलेज में तरह तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते है, वहां बैनर, पोस्टर बनाने की प्रतियोगिता, निबंध, भाषण, पेंटिंग, कविता, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता आदि का आयोजन होता है.

सरदार पटेल जन्म31 अक्टूबर 1875
मृत्यु15 दिसम्बर 1950
राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुवात31 अक्टूबर 2014
किसके द्वारा शुरू हुआप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा

राष्ट्रीय एकता दिवस् का महत्व : (Rashtriya Ekta Diwas Importance)

आज देश के युवाओं को यह समझाने की जरुरत हैं कि एकता देश के लिए कितनी जरुरी हैं. ऐसे में राष्ट्रीय एकता दिवस का होना बेहद जरुरी हैं. ऐसे दिन ही युवाओं को इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं.

आज के समय में एकता इस तरह खंडित हो चुकी हैं कि इसका महत्व सबसे पहले परिवार जो कि समाज की सबसे छोटी इकाई हैं, को समझना चाहिये क्यूंकि आज परिवारों में ही एकता नहीं हैं. इसी कारण समाज में एकता नही हैं और अगर समाज में एकता नहीं होगी तो गाँव, शहर, राज्य एवम देश में कैसे हम एकता की उम्मीद रख सकेंगे.

एकता के लिए जरुरी हैं आज की पीढ़ी एवम पहले की पीढ़ी आपसी विचारों को व्यक्त करे, एवम एक दुसरे को अपनी-अपनी स्थिती से अवगत करायें. साथ ही एक हल की उम्मीद में ही बातचीत शुरू की जाये. पीढ़ियों में जो विवाद होता हैं उसका कोई हल नहीं होता हर व्यक्ति अपने आपको सही मानता हैं ऐसे में परिवार टूट जाते हैं इसलिए जरुरी हैं कि बातचीत हो एवम ऐसा वातावरण हो कि परिवार का हर एक सदस्य अपनी बात कह सके और हल ढूंढा जा सके. परिवारों का टूट जाना तो आसान हैं. उनका एक साथ रहना मुश्किल हैं और इन टूटे हुए परिवारों का प्रभाव देश पर भी पड़ता हैं.

अगर हम सभी विकास चाहते हैं तो प्रधानमंत्री मोदी जी के उस नारे को ध्यान में रखे जिसमे उन्होंने कहा हैं सबका साथ सबका विकास.

मैंने जो परिवार का उदाहरण आपके सामने रखा शायद आप उसे राष्ट्रीय एकता से न जोड़ पाये, लेकिन मेरा मानना तो यही हैं कि जब तक परिवारों में एकता नहीं होगी, तब तक देश में एकता नहीं हो सकती और जब तक एकता नहीं होगी, तब तक विकास की गति अवरुद्ध एवम दिशाहीन होती रहेगी.

इस प्रकार आज के समय में राष्ट्रीय एकता दिवस का होना जरुरी हैं.

राष्ट्रीय एकता दिवस स्लोगन नारे अनमोल वचन (Rashtriya Ekta Diwas Slogan Quotes)

  • एकता – मूलमंत्र हैं यह विकास का, देश के सौंदर्य और उद्दार का

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  • हर एक शब्द भारी हैं, जब एकता में देश की हर कौम सारी हैं.

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  • एकता ही देश का बल हैं, एकता में ही सुनहरा पल हैं.

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  • जब तक रहेगी साठ गाठ, होता रहेगा देश का विकास.

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  • याद रखो एकता का मान, तब ही होगी देश आन.

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  • एकता में ही संबल हैं जिस देश में नही वो दुर्बल हैं.

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राष्ट्रिय एकता दिवस पर कविता  (Rashtriya Ekta Diwas Kavita)

राष्ट्र की एकता ही हैं उसका आधार
न थोपों उस पर सांप्रदायिक विचार
क्यूँ करते हो भेद ईश्वर के बन्दों में
हर मज़हब सिखाता हैं प्रेम बाँटो सब में
क्यूँ करते हो वैचारिक लड़ाई
बनता हैं यह भारत माँ के लिए दुखदाई
एक भूमि का टुकड़ा नहीं हैं मेरा देश
मेरी माँ का हैं यह सुंदर परिवेश
इसके उद्धार में ही हैं अलौकिक प्रकाश  
सबके साथ में ही हैं सबका विकास
एकता ही हैं अंत दुखों का
एकता में ही हैं कल्याण अपनों का

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मैं नहीं तू, तू नहीं मैं
कब तक चलेगा ये मतभेद
कैसे अनपढ़ हैं कहने वाले
जो देश को सांप्रदायिक सोच देते हैं
फूट डालो और राज करो
कैसे वो ये नारा भुला बैठे हैं
अंग्रेज हो या कोई हमने ही तो अवसर दिया
आपसी लड़ाई में हमने मातृभूमि को गँवा दिया
आज भी उसी सोच के गुलाम हैं हम
खुद ही अपने देश के शत्रु बन रहे हैं हम
फिर से कही मौका न दे बैठे
चलो सुलझाये और आज साथ आकर बैठे

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Karnika

कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं

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भारत की संस्कृति कई चीज़ों को मिला-जुलाकर बनती है जिसमें भारत का महान इतिहास, विलक्षण भूगोल और सिन्धु घाटी की सभ्यता के दौरान बनी और आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई, बौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके अस्तगमन के साथ फली-फूली अपनी खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रिवाज़, परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश है। पिछली पाँच सहस्राब्दियों से अधिक समय से भारत के रीति-रिवाज़, भाषाएँ, प्रथाएँ और परंपराएँ इसके एक-दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का एक अद्वितीय उदाहरण देती हैं। भारत कई धार्मिक प्रणालियों (religious systems), जैसे कि हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म जैसे धर्मों का जनक है। इस मिश्रण से भारत में उत्पन्न हुए विभिन्न धर्म और परम्पराओं (traditions) ने विश्व के अलग - अलग हिस्सों को भी काफ़ी प्रभावित किया है

भारतीय संस्कृति का महत्व[संपादित करें]

भारतीय संस्कृति विश्व के इतिहास में कई दृष्टियों से विशेष महत्त्व रखती है।

  • यह संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। भारतीय संस्कृति कर्म प्रधान संस्कृति है।मोहनजोदड़ो की खुदाई के बाद से यह मिस्र, मेसोपोटेमिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के समकालीन समझी जाने लगी है।
  • प्राचीनता के साथ इसकी दूसरी विशेषता अमरता है। चीनी संस्कृति के अतिरिक्त पुरानी दुनिया की अन्य सभी - मेसोपोटेमिया की सुमेरियन, असीरियन, बेबीलोनियन और खाल्दी प्रभृति तथा मिस्र ईरान, यूनान और रोम की-संस्कृतियाँ काल के कराल गाल में समा चुकी हैं, कुछ ध्वंसावशेष ही उनकी गौरव-गाथा गाने के लिए बचे हैं; किन्तु भारतीय संस्कृति कई हज़ार वर्ष तक काल के क्रूर थपेड़ों को खाती हुई आज तक जीवित है।
  • उसकी तीसरी विशेषता उसका जगद्गुरु होना है। उसे इस बात का श्रेय प्राप्त है कि उसने न केवल महाद्वीप-सरीखे भारतवर्ष को सभ्यता का पाठ पढ़ाया, अपितु भारत के बाहर बड़े हिस्से की जंगली जातियों को सभ्य बनाया, साइबेरिया के सिंहल (श्रीलंका) तक और मैडीगास्कर टापू, ईरान तथा अफगानिस्तान से प्रशांत महासागर के बोर्नियो, बाली के द्वीपों तक के विशाल भू-खण्डों पर अपनी अमिट प्रभाव छोड़ा।

संस्कृति

  • सर्वांगीणता, विशालता, उदारता, प्रेम और सहिष्णुता की दृष्टि से अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अग्रणी स्थान रखती है।

भाषा[संपादित करें]

मुख्य लेख : List of Indian languages by number of native speakers

भारत में बोली जाने वाली भाषाओँ की बड़ी संख्या ने यहाँ की संस्कृति और पारंपरिक विविधता को बढ़ाया है। १००० (यदि आप प्रादेशिक बोलियों और प्रादेशिक शब्दों को गिनें तो, जबकि यदि आप उन्हें नहीं गिनते हैं तो ये संख्या घट कर २१६ रह जाती है) भाषाएँ ऐसी हैं जिन्हें १०,००० से ज्यादा लोगों के समूह द्वारा बोला जाता है, जबकि कई ऐसी भाषाएँ भी हैं जिन्हें १०,००० से कम लोग ही बोलते है। भारत में कुल मिलाकर ४१५ भाषाएं उपयोग में हैं भारतीय संविधान ने संघ सरकार के संचार के लिए हिंदी और अंग्रेजी, इन दो भाषाओं के इस्तेमाल को आधिकारिक भाषा (official language) घोषित किया है व्यक्तिगत राज्यों के उनके अपने आतंरिक संचार के लिए उनकी अपनी राज्य भाषा (state's language) का इस्तेमाल किया जाता है भारत में दो प्रमुख भाषा सम्बन्धी परिवार हैं - भारतीय-आर्य भाषाएं और द्रविण भाषाएँ, इनमें से पहला भाषा के परिवार मुख्यतः भारत के उत्तरी (northern), पश्चिमी (western), मध्य (central) और पूर्वी (eastern) क्षेत्रों के फैला हुआ है जबकि दूसरा भाषा परिवार भारत के दक्षिणी भाग में.भारत का अगला सबसे बड़ा भाषा परिवार है एस्ट्रो-एशियाई (Austro-Asiatic) भाषा समूह, जिसमें शामिल हैं भारत के मध्य और पूर्व में बोली जाने वाली मुंडा भाषाएँ (Munda languages), उत्तरपूर्व में बोई जाने वाली खासी भाषाएँ (Khasian languages) और निकोबार द्वीप (Nicobarese languages) में बोली जाने वाली निकोबारी भाषाएँ (Nicobar Islands).भारत का चौथा सबसे बड़ा भाषा परिवार है तिब्बती- बर्मन भाषाओँ (Tibeto-Burman languages) का परिवार जो अपने आप में चीनी- तिब्बती भाषा परिवार का एक उपसमूह है। "कोस कोस पे पानी बदले, चार कोस पे बानी"

धर्म[संपादित करें]

धर्मजनसंख्याप्रतिशत
सभी धर्म१,०२८,६१०,३२८१००.००%
हिन्दू८२७,५७८,८६८८०.४५६%
मुसलमान१३८,१८८,२४०१३.४३४%
ईसाई२४,०८०,०१६२.३४१%
सिख१९,२१५,७३०१.८६८%
बौद्ध७,९५५,२०७०.७७३%
जैन४,२२५,०५३०.४११%
अन्य६,६३९,६२६०.६४५४%
धर्म नहीं कहा७२७,५८८०.०७%

मुख्य लेख : भारत में धर्म और भारतीय धार्मिक समुदाय

अब्राहमिक के बाद भारतीय धर्म (Indian religions) विश्व के धर्मों में प्रमुख है, जिसमें हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म, आदि जैसे धर्म शामिल हैं आज, हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म क्रमशः दुनिया में तीसरे और चौथे सबसे बड़े धर्म हैं, जिनमें लगभग १.४ अरब अनुयायी साथ हैं।

विश्व भर में भारत में धर्मों में विभिन्नता सबसे ज्यादा है, जिनमें कुछ सबसे कट्टर धार्मिक संस्थायें और संस्कृतियाँ शामिल हैं। आज भी धर्म यहाँ के ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों के बीच मुख्य और निश्चित भूमिका निभाता है।

८०.४% से ज्यादा लोगों का धर्म हिन्दू धर्म है। कुल भारतीय जनसँख्या का १३.४% हिस्सा इस्लाम धर्म को मानता है[1]सिख धर्म, जैन धर्म और खासकर के बौद्ध धर्म का केवल भारत में नहीं बल्कि पुरे विश्व भर में प्रभाव है ईसाई धर्म, पारसी धर्म, यहूदी और बहाई धर्म (Bahá'í Religion ) भी प्रभावशाली हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है। भारतीय जीवन में धर्म की मज़बूत भूमिका के बावजूद नास्तिकता और अज्ञेयवादियों (agnostic) का भी प्रभाव दिखाई देता है।

समाज[संपादित करें]

समीक्षा[संपादित करें]

यूजीन एम. मकर के अनुसार, भारतीय पारंपरिक संस्कृति अपेक्षाकृत कठोर सामाजिक पदानुक्रम द्वारा परिभाषित किया गया है उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को छोटी उम्र में ही उनकी भूमिकाओं और समाज में उनके स्थान के बारे में बताते रहा जाता है[2] उनको इस बात से और बल मिलता है की और इसका मतलब यह है कि बहुत से लोग इस बात को मानते हैं की उनकी जीवन को निर्धारण करने में देवताओं और आत्माओं की ही पूरी भूमिका होती है[2] धर्म विभाजित संस्कृति जैसे कई मतभेद.[2] जबकि, इनसे कहीं ज्यादा शक्तिशाली विभाजन है हिन्दू परंपरा में मान्य अप्रदूषित और प्रदूषित व्यवसायों का.[2] सख्त सामाजिक अमान्य लोग इन हजारों लोगों के समूह को नियंत्रित करते हैं[2] हाल के वर्षों, खासकर शहरों में, इनमें से कुछ श्रेणी धुंधली पड़ गई हैं और कुछ घायब हो गई हैं[2]एकल परिवार (Nuclear family) भारतीय संस्कृति के लिए केंद्रीय है। महत्वपूर्ण पारिवारिक सम्बन्ध उतनी दूर तक होते हैं जहाँ तक समान गोत्र (gotra) के सदस्य हैं, गोत्र हिन्दू धर्मं के अनुसार पैतृक यानि पिता की ओर से मिले कुटुंब या पंथ के अनुसार निर्धारित होता है जो की जन्म के साथ ही तय हो जाता है।[2] ग्रामीण क्षेत्रों में, परिवार के तीन या चार पीढ़ियों का एक ही छत के नीचे रहना आम बात है[2]वंश या धर्म प्रधान (Patriarch) प्रायः परिवार के मुद्दों को हल करता है।[2]

विकासशील देशों में, भारत अपनी निम्न स्तर की भौगोलिक और व्यावसायिक गतिशीलता की वजह से वृहद रूप से दर्शनीय है यहाँ के लोग कुछ ऐसे व्यवसाय को चुनते हैं जो उनके माता-पिता पहले से करते आ रहे हैं और कभी-कभार भौगोलिक रूप से वो अपने समाज से दूर जाते हैं[3]

जाति व्यवस्था[संपादित करें]

मुख्य लेख : Caste system in India

भारतीय पारंपरिक संस्कृति अपेक्षाकृत कठोर सामाजिक पदानुक्रम द्वारा परिभाषित किया गया है[2]भारतीय जाति प्रथाभारतीय उपमहाद्वीप (Indian subcontinent) में सामाजिक वर्गीकरण (social stratification) और सामाजिक प्रतिबंधों का वर्णन करती हैं, इस प्रथा में समाज के विभिन्न वर्ग हजारों सजातीय विवाह (endogamous) और आनुवाशिकीय समूहों के रूप में पारिभाषित किये जाते हैं जिन्हें प्रायः जाति (jāti) एस या कास्ट (caste) के नाम से जाना जाता है इन जातियों के बीच विजातीय समूह (exogamous group) भी मौजूद है, इन समूहों को गोत्र के रूप में जाना जाता है। गोत्र (gotras), किसी व्यक्ति को अपने कुटुम्भ द्वारा मिली एक वंशावली (clan) की पहचान है, यद्यपि कुछ उपजातियां जैसे की शकाद्विपी (Shakadvipi) ऐसी भी हैं जिनके बीच एक ही गोत्र में विवाह स्वीकार्य है, इन उपजातियों में प्रतिबंधित सजातीय विवाह जानी एक जाति के बीच विवाह को प्रतिबंद्धित करने के लिए कुछ अन्य तरीकों को अपनाया जाता है (उदाहरण के लिए - एक ही उपनाम वाले वंशों के बीच विवाह पर प्रतिबन्ध लगाना)

भले ही जाति व्यवस्था को मुख्यतः हिन्दू धर्म के साथ जोड़कर पहचाना जाता है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में अन्य कई धर्म जैसे की मुसलमान (Muslim) और ईसाई (Christian) धर्म के कुछ समूहों में भी इस तरह की व्यवस्था देखी गई है[4]भारतीय संविधान ने समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता (secular), लोकतंत्र जैसे सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए जाति के ऊपर आधारित भेदभावों को गिअर्कानूनी घोषित कर दिया है[5] बड़े शहरों में ज़्यादातर इन जाति बंधनों को तोड़ दिया गया है,[6] हालाँकि ये आज भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान है फिर भी, आधुनिक भारत में, जाति व्यवस्था, जाति के आधार पर बांटे वाली राजनीति और अलग - अलग तरीके की सामाजिक धारणाओं जैसे कई रूप में जीवित भी है और प्रबल भी होता जा रहा है[7][8]

सामान्य शब्दों में, जाति के आधार पर पाँच प्रमुख विभाजन हैं:[2]

  • ब्राह्मण - "विद्वान समुदाय," जिनमें याजक, विद्वान, विधि विशेषज्ञ, मंत्री और राजनयिक शामिल हैं।
  • क्षत्रिय - "उच्च और निम्न मान्यवर या सरदार" जिनमें राजा, उच्चपद के लोग, सैनिक और प्रशासक को शामिल है।
  • वैश्य - "व्यापारी और कारीगर समुदाय" जिनमें सौदागर, दुकानदार, व्यापारी और खेत के मालिक शामिल है।
  • शूद्र - "सेवक या सेवा प्रदान करने वाली प्रजाति" में अधिकतर गैर-प्रदूषित कार्यो में लगे शारीरिक और कृषक श्रमिक शामिल हैं।

इसके भी नीचे एक दलित समाज है जिसे हिन्दू शास्त्रों और हिन्दू कानून के अनुसार को अछूत (दलित) के रूप में जाना जाता है, हालाँकि इस प्रणाली को भारतीय संविधान के कानून के जरिए अब गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।

ब्राह्मण वर्ण स्वयं को हिंदू धर्म के चारों वर्णों (four varnas) में सर्वोच्च स्थान पर काबिज होने का दावा करता है[9]दलित शब्द उन लोगों के समूह के लिए एक पदनाम है जिनको हिन्दू धर्म एवं सवर्ण हिन्दूओं व्दारा अछूत (untouchables) या नीची जाति (caste) का माना जाता है। स्वतंत्र भारत में जातिवाद से प्रेरित हिंसा और घृणा अपराध (hate crime) को बहुत ज़्यादा देखा गया।

परिवार[संपादित करें]

मुख्य लेख : Arranged marriage in India और Women in India

में होने वाली एक हिंदू विवाह समारोह

भारतीय समाज सदियों से तयशुदा शादियों (Arranged marriages) की परंपरा रही है। आज भी भारतीय लोगों का एक बड़ा हिस्सा अपने माता-पिता या अन्य सम्माननीय पारिवारिक सदस्यों द्वारा तय की गई शादियाँ ही करता है, जिसमें दूल्हा-दुल्हन की सहमति भी होती है[10] तयशुदा शादियाँ कई चीज़ों का मेल कराने के आधार पर उन्हीं को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती हैं जैसे कि उम्र, ऊँचाई, व्यक्तिगत मूल्य और पसंद, साथ ही उनके परिवारों की पृष्ठभूमि (धन, समाज में स्थान) और उनकी जाति (caste) के साथ - साथ युगल की कुन्दलिनीय (horoscopes) अनुकूलता

भारत में शादियों को जीवन भर के लिए माना जाता है[11] और यहाँ तलाक की दर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की ५०% की तुलना में मात्र १.१% है[12] . तयशुदा शादियों में तलाक की दर और भी कम होती है। हाल के वर्षों में तलाकदर में काफी वृद्धि हो रही है:

इस बात पर अलग अलग राय है कि इसका मतलब क्या है: पारंपरिक लोगों के लिए ये बढती हुई संख्या समाज के विघटन को प्रदर्शित करती है, जबकि आधुनिक लोगों के अनुसार इससे ये बात पता चलती है कि समाज में महिलाओं का एक नया और स्वस्थ सशक्तिकरण हो रहा है।[13]

हालाँकि, बाल विवाह (child marriage) को १८६० में ही गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था लेकिन भारत के कुछ हिस्सों में ये प्रथा आज भी जारी है[14] यूनिसेफ द्वारा संसार के बच्चों की दशा के बारे में जारी रिपोर्ट " स्टेट ऑफ़ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन -२००९" में ४७% ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय महिलाएं जो कि २०-२४ साल की होंगी उनकी शादी को विवाह के लिए वैध १८ साल की उम्र से पहले ही कर दी जाती हैं[15] रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि विश्व में ४०% होने वाले बाल विवाह अकेले भारत में ही होते हैं[16]

भारतीय नाम (Indian name) भिन्न प्रकार की प्रणालियों और नामकरण प्रथा (naming conventions) पर होती हैं, जो की अलग -अलग शेत्रों के अनुसार बदलती रहती हैं नाम भी धर्म और जाति से प्रभावित होती हैं और वो धर्म या महाकाव्यों से लिए जा सकते हैं भारत की आबादी अनेक प्रकार की भाषाएं बोलती हैं

समाज में नारी की भूमिका अक्सर घर के काम काज को करने की और समुदायों की नि: स्वार्थ सेवा करने का काम होता है[2] महिलाओं और महिलाओं के मुद्दों समाचारों में केवल ७-१४% ही दिखाई देते हैं[2] अधिकांश भारतीय परिवारों में, महिलाओं को उनके नाम पर संपत्ति नहीं मिलती है और उन्हें पैतृक संपत्ति का एक हिस्सा भी नहीं मिलता है।[17] कानून को लागू करने मे कमजोरी के कारण, महिल्लाएं आज भी ज़मीन के छोटे से टुकड़े और बहुत कम धन मे प्राप्त होता है[18] कई परिवारों में, विशेष रूप से ग्रामीण लोगों मे, लड़कियों और महिलाओं को परिवार के भीतर पोषण भेदभाव का सामना करना पड़ता है और इसी वजह से उनमें खून की कमी की शिकायत रहती है साथ- साथ वो कुपोषित भी होती हैं[17]

रंगोली (या कोलम) एक परंपरागत कला है जो कि भारतीय महिलाओं में बहुत लोकप्रिय हैलोकप्रिय महिला पत्रिकाएं जिनमें फेमिना (Femina) गृहशोभा (Grihshobha), वनिता (vanita), वूमेनस एरा, आदि शामिल हैं

पशु[संपादित करें]

में स्थित आलंकृत गोप्पुरम मंदिर]] मे रंगा या चित्रित किया जाता है

इन्हें भी देखें: Animal husbandry in India एवं Sacred cow

कई भारतीयों के पास अपने मवेशी होते हैं जैसे कि गाय-बैल या भेड़

आज भी हिन्दू बहुसंख्यक देशों जैसे भारत और नेपाल में गाय के दूध का धार्मिक रस्मों में महत्वपूर्ण स्थान है। समाज में अपने इसी ऊंचे स्थान की वजह से गायें भारत के बड़े बड़े शहरों जैसे कि दिल्ली में भी व्यस्त सड़कों के पर खुले आम घूमती हैं। कुछ जगहों पर सुबह के नाश्ते के पहले इन्हें एक भोग लगाना शुभ या सौभाग्यवर्धक माना जाता है। जिन जगहों पर गोहत्या एक अपराध है वहां किसी नागरिक को गाय को मार डालने या उसे चोट पहुँचाने के लिए जेल भी हो सकती है।

गाय को खाने के विरुद्ध आदेश में एक प्रणाली विकसित हुई जिसमें सिर्फ एक जातिच्युत मनुष्य (pariah) को मृत गायों को भोजन के रूप में दिया जाता था और सिर्फ वही उनके चमड़े (leather) को निकाल सकते थे। सिर्फ दो राज्यों :पश्चिम बंगाल और केरल के अतिरिक्त हर प्रान्त में गोहत्या निषिद्ध है। हालाँकि गाय के वध के उद्देश्य से उन्हें इन राज्यों में ले जाना अवैध है, लेकिन गायों को नियमित रूप से जहाज़ में सवार कर इन राज्यों में ले जाया जाता है।[19] "गाय हमारी माता है" ऐसा विभिन्न जगह कहा जाता है, खास कर बुंदेलखण्ड की तरफ़।

परम्परा एवं रीति[संपादित करें]

नमस्ते या नमस्कार या नमस्कारम्भारतीय उपमहाद्वीप में अभिनन्दन या अभिवादन करने के सामान्य तरीके हैं। यद्यपि नमस्कार को नमस्ते की तुलना में ज्यादा औपचारिक माना जाता है, दोनों ही गहरे सम्मान के सूचक शब्द हैं। आम तौर पर इसे भारत और नेपाल में हिन्दू, जैन और बौद्ध लोग प्रयोग करते हैं, कई लोग इसे भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी प्रयोग करते हैं। भारतीय और नेपाली संस्कृति में ये शब्द लिखित या मौखिक बोलचाल की शुरुआत में प्रयोग किया जाता है। हालाँकि विदा होते समय भी हाथ जोड़े हुए यही मुद्रा बिना कुछ कहे बनायी जाती है। योग में, योग गुरु और योग शिष्यों द्वारा बोले जाने वाली बात के आधार पर नमस्ते का मतलब "मेरे भीतर की रोशनी तुम्हारे अन्दर की रोशनी का सत्कार करती है " होता है

शाब्दिक अर्थ में, इसका मतलब है "मैं आपको प्रणाम करता हूँ" यह शब्द संस्कृत शब्द (नमस्): प्रणाम (bow), श्रद्धा (obeisance), आज्ञापालन, वंदन (salutation) और आदर (respect) और (ते): "आपको" से लिया गया है।

किसी और व्यक्ति से कहे जाते समय, साधारण रूप से इसके साथ एक ऐसी मुद्रा बनाई जाती है जिसमें सीने या वक्ष के सामने दोनों हाथों की हथेलियाँ एक दूसरे को छूती हुई और उंगलियाँ ऊपर की ओर होती हैं। बिना कुछ कहे भी यही मुद्रा बनकर यही बात कही जा सकती है।

भातीय व्यंजनों में से ज़्यादातर में मसालों और जड़ी बूटियों का परिष्कृत और तीव्र प्रयोग होता है इन व्यंजनों के हर प्रकार में पकवानों का एक अच्छा-खासा विन्यास और पकाने के कई तरीकों का प्रयोग होता है यद्यपि पारंपरिक भारितीय भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा शाकाहारी है लेकिन कई परम्परागत भारतीय पकवानों में मुर्गा (chicken), बकरी (goat), भेड़ का बच्चा (lamb), मछली और अन्य तरह के मांस (meat) भी शामिल हैं

भोजन भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो रोज़मर्रा के साथ -साथ त्योहारों में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है कई परिवारों में, हर रोज़ का मुख्य भोजन दो से तीन दौर में, कई तरह की चटनी और अचार के साथ, रोटी (roti) और चावल के रूप में कार्बोहाइड्रेट के बड़े अंश के साथ मिष्ठान (desserts) सहित लिया जाता है भोजन एक भारतीय परिवार के लिए सिर्फ खाने के तौर पर ही नहीं बल्कि कई परिवारों के एक साथ एकत्रित होने सामाजिक संसर्ग बढाने के लिए भी महत्वपूर्ण है

विविधता भारत के भूगोल, संस्कृति और भोजन की एक पारिभाषिक विशेषता है भारतीय व्यंजन अलग-अलग क्षेत्र के साथ बदलते हैं और इस उपमहाद्वीप (subcontinent) की विभिन्न तरह की जनसांख्यिकी (varied demographics) और विशिष्ठ संस्कृति को प्रतिबिंबित करते हैं आम तौर पर, भारतीय व्यंजन चार श्रेणियों में बाते जा सकते हैं : उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम भारतीय व्यंजन इस विविधता के बावजूद उन्हें एकीकृत करने वाले कुछ सूत्र भी मौजूद हैं मसालों का विविध प्रयोग भोजन तैयार करने का एक अभिन्न अंग है, ये मसाले व्यंजन का स्वाद बढाने और उसे एक ख़ास स्वाद और सुगंध देने के लिए प्रयोग किये जाते हैं इतिहास में भारत आने वाले अलग-अलग सांस्कृतिक समूहों जैसे की पारसी (Persians), मुग़ल और यूरोपीय शक्तियों ने भी भारत के व्यंजन को काफी प्रभावित किया है

वस्त्र-धारण[संपादित करें]

महिलाओं के लिए पारंपरिक भारतीय कपडों में शामिल हैं, साड़ी, सलवार कमीज़ (salwar kameez) और घाघरा चोली (लहंगा)धोती, लुंगी (Lungi), और कुर्तापुरुषों (men) के पारंपरिक वस्त्र हैं बॉम्बे, जिसे मुंबई के नाम से भी जाना जाता है भारत की फैशन राजधानी है भारत के कुछ ग्रामीण हिस्सों में ज़्यादातर पारंपरिक कपडे ही पहने जाते हैं दिल्ली, मुंबई,चेन्नई, अहमदाबाद और पुणे ऐसी जगहें हैं जहां खरीदारी करने के शौकीन लोग जा सकते हैं दक्षिण भारत के पुरुष सफ़ेद रंग का लंबा चादर नुमा वस्त्र पहनते हैं जिसे अंग्रेजी में धोती और तमिल में वेष्टी कहा जाता है धोती के ऊपर, पुरुष शर्ट, टी शर्ट या और कुछ भी पहनते हैं जबकि महिलाएं साड़ी पहनती हैं जो की रंग बिरंगे कपडों और नमूनों वाला एक चादरनुमा वस्त्र हैं यह एक साधारण या फैंसी ब्लाउज के ऊपर पहनी जाती है यह युवा लड़कियों और महिलाओं द्वारा पहना जाता है। छोटी लड़कियां पवाडा पहनती हैं पवाडा एक लम्बी स्कर्ट है जिसे ब्लाउज के नीचे पहना जाता है। दोनों में अक्सर खुस्नूमा नमूने बने होते हैं बिंदी (Bindi) महिलाओं के श्रृंगार का हिस्सा है। परंपरागत रूप से, लाल बिंदी (या सिन्दूर) केवल शादीशुदा हिंदु महिलाओं द्वारा ही लगाईं जाती है, लेकिन अब यह महिलाओं के फैशन का हिस्सा बन गई है।[20]भारतीय और पश्चिमी पहनावा (Indo-western clothing), पश्चिमी (Western) और उपमहाद्वीपीय (Subcontinental) फैशन (fashion) का एक मिला जुला स्वरूप हैं अन्य कपडों में शामिल हैं - चूडीदार (Churidar), दुपट्टा (Dupatta), गमछा (Gamchha), कुरता, मुन्दुम नेरियाथुम (Mundum Neriyathum), शेरवानी .

साहित्य[संपादित करें]

इतिहास[संपादित करें]

मुख्य लेख : Indian literature

भारतीय साहित्य की सबसे पुरानी या प्रारंभिक कृतियाँ मौखिक (orally) रूप से प्रेषित थीं।संस्कृत साहित्य की शुरुआत होती है 5500 से 5200 ईसा पूर्व के बीच संकलित ऋग्वेद से जो की पवित्र भजनों का एक संकलन है। संस्कृत के महाकाव्य रामायण और महाभारत पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के अंत में आये.पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व की पहली कुछ सदियों के दौरान शास्त्रीय संस्कृत (Classical Sanskrit) खूब फली-फूली, तमिल (Tamil) संगम साहित्य और पाली केनोन (Pāli Canon) ने भी इस समय काफी प्रगति की.

मध्ययुगीन काल में, क्रमशः ९ वीं और ११ वीं शताब्दी में कन्नड़ और तेलुगु (Telugu) साहित्य की शुरुआत हुई,[22] इसके बाद १२ वीं शताब्दी में मलयालम साहित्य की पहली रचना हुई.बाद में, मराठी, बंगाली, हिंदी की विभिन्न बोलियों, पारसी (Persian) और उर्दू के साहित्य भी उजागर होने शुरू हो गए

ब्रिटिश राज के दौरान, रवीन्द्रनाथ टैगोर के कार्यों द्वारा आधुनिक साहित्य का प्रतिनिधित्व किया गया है, रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh 'Dinkar'), सुब्रमनिया भारती, राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan), कुवेम्पु (Kuvempu), बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, माइकल मधुसूदन दत्त, मुंशी प्रेमचन्द, मुहम्मद इकबाल, देवकी नंदन खत्री (Devaki Nandan Khatri) प्रसीद्ध हो गए हैं समकालीन भारत में, जिन लेखकों को आलोचकों के बीच प्रशंसा मिली वो हैं : गिरीश कर्नाड, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, वैकोम मुहम्मद बशीर (Vaikom Muhammad Basheer), इंदिरा गोस्वामी (Indira Goswami), महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम, मास्ति वेंकटेश अयेंगर, कुरतुलियन हैदर और थाकाजी सिवासंकरा पिल्लई (Thakazhi Sivasankara Pillai) और कुछ अन्य लेखकों ने आलोचकों की प्रशंसा प्राप्त की समकालीन भारतीय साहित्य में, दो प्रमुख साहित्यिक पुरस्कार हैं, ये हैं साहित्य अकादमी फैलोशिप (Sahitya Akademi Fellowship) और ज्ञानपीठ पुरस्कारहिंदी और कन्नड़ में सात, मलयालम और मराठी में चार उर्दू में तीन ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए गए हैं[23]

काव्य[संपादित करें]

मुख्य लेख : Indian poetry

भारत में ऋग्वेद के समय से कविता के साथ-साथ गद्य रचनाओं की मजबूत परंपरा है कविता प्रायः संगीत की परम्पराओं से सम्बद्ध होती है और कविताओं का एक बड़ा भाग धार्मिक आंदोलनों पर आधारित होता है या उनसे जुड़ा होता है लेखक और दार्शनिक अक्सर कुशल कवि भी होते थे आधुनिक समय में, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्र वाद और अहिंसा को प्रोत्साहित करने के लिए कविता ने एक महत्वपूर्ण हथियार की भूमिका निभाई है इस परंपरा उदाहरण आधुनिक काल में रवीन्द्रनाथ टैगोर और के एस नरसिम्हास्वामी (K. S. Narasimhaswamy) की कविताओं, मध्य काल में बासव (Basava) (वचन (vachana)), कबीर और पुरंदरदास (पद और देवार्नामस) और प्राचीन काल में महाकाव्यों के रूप में मिलता है टगोर की गीतांजलि कविता से दो उदाहरण भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किये गए हैं

महाकाव्य[संपादित करें]

मुख्य लेख : Indian epic poetry

रामायण और महाभारत प्राचीनतम संरक्षित और आज भी भारत के जाने माने माहाकाव्य है ; उनके कुछ और संस्करण दक्षिण पूर्व एशियाई देशों जैसे की थाईलैंडमलेशिया और इंडोनेशिया में अपनाए गए हैं इसके अलावा, शास्त्रीय तमिल भाषा में पांच महाकाव्य हैं - सिलाप्पधिकाराम (Silappadhikaram), निमेगालाई (Manimegalai), जीवागा चिंतामणि (Jeevaga-chintamani), वलैयापति और कुण्डलकेसि इनके अन्य क्षेत्रीय रूप और असम्बद्ध महाकाव्यों में शामिल हैं तमिल कंब रामायण, कन्नड़ में आदिकवि पम्पा (Adikavi Pampa) द्वारा पम्पा भारता, कुमार वाल्मीकि द्वारा तोरवे रामायण, कुमार व्यास (Kumaravyasa) द्वारा कर्नाट भारता कथा मंजरी, हिंदी रामचरितमानस, मलयालम अध्यात्मरामायणम् (Adhyathmaramayanam)

प्रदर्शन कला

भारत उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय सांस्कृतिक सीमाओं और क्षेत्रों की स्थिरता और ऐतिहासिक स्थायित्व को प्रदर्शित करता हुआ मानचित्र
"दीवाली, प्रकाश पर्व या त्यौहार, पूरे भारत में हिन्दुओं द्वारादीये (diyas) जलाकर औररंगोलीबनाकर मनाया जाता है।

त्यौहार[संपादित करें]

मुख्य लेख : Festivals in India

भारत एक बहु सांस्कृतिक और बहु धार्मिक समाज होने के कारण विभिन्न धर्मों के त्योहारों और छुट्टियों को मनाता है भारत में तीन राष्ट्रीय अवकाश (national holidays in India) है, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती (Gandhi Jayanti) और इन तीनो को हर्षो उल्लास के साथ मनाया जाता है इसके अलावा, कई राज्यों और क्षेत्रों में वहाँ के मुख्य धर्म और भाषागत जनसांख्यिकी पर आधारित स्थानीय त्यौहार हैं लोकप्रिय धार्मिक त्यौहार में शामिल हैं हिन्दुओं कादिवाली,गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi),होली,नवरात्रि,रक्षाबंधन (Rakshabandhan) औरदशहरा (Dussehra). कई खेती त्यौहार (harvest festival) जैसे कीसंक्रांति (Sankranthi),पोंगल (Pongal) औरओणम (Onam) भी काफी लोकप्रिय त्यौहार हैकुम्भ का मेला (Kumb Mela) हर १२ साल के बाद ४ अलग -अलग स्थानों पर मनाया जाने वाला एक बहुत बड़ा सामूहिक तीर्थ यात्रा उत्सव है जिसमें करोंडों हिन्दू हिस्सा लेते हैं भारत में कुछ त्योहारों कई धर्मों द्वारा मनाया जाता है। इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं हिन्दुओं, सिखों और जैन समुदाय के लोगों द्वारा मनाई जाने वाली दिवाली और बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म के लोगों द्वारा मनाई जाने वालीबुद्ध पूर्णिमा (Buddh Purnima) . इस्लामी त्यौहार जैसे कीईद-उल-फ़ित्र,ईद -उल-अधा (Eid al-Adha) औररमजान (Ramadan) भी पूरे भारत के मुसलामानों द्वारा मनाये जाते हैं

भोजन[संपादित करें]

मुख्य लेख : Cuisine of India

और सब्ज़ी.

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